भारत के यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) से मार्च 2026 में 29.5 लाख करोड़ रुपये के लगभग 22.6 अरब लेनदेन हुए। पूरे वित्त वर्ष 2026 में कुल 241.617 अरब लेनदेन हुए थे जिनका मूल्य लगभग 314.23 लाख करोड़ रुपये था।
भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) ने यूपीआई को एक सुरक्षित, त्वरित और अंतर-संचालनीय तत्काल भुगतान प्रणाली के रूप में विकसित किया था और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के तत्कालीन गवर्नर रघुराम राजन ने 11 अप्रैल 2016 को 21 सदस्य बैंकों के साथ प्रयोग के स्तर पर इसकी शुरुआत कर दी। बैंकों ने 25 अगस्त 2016 से गूगल प्ले स्टोर पर यूपीआई-सक्षम ऐप उपलब्ध कराना शुरू कर दिया था। उस महीने लगभग 3 करोड़ रुपये मूल्य के 93,000 लेनदेन हुए थे। उसी साल 30 दिसंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यूपीआई-आधारित भीम (भारत इंटरफेस फॉर मनी) ऐप की शुरुआत की।
एनपीसीआई की सलाह से एक स्वतंत्र थर्ड पार्टी अनुसंधान एजेंसी द्वारा हाल में किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि वर्ष 2021 और 2025 के बीच भारत में डिजिटल लेनदेन लगभग 11 गुना बढ़ गए जिनमें यूपीआई की हिस्सेदारी 80 फीसदी रही। व्यापारियों के बीच डिजिटल माध्यम से लेनदेन अब आम बात हो गई है। लगभग 94 फीसदी छोटे व्यापारियों ने यूपीआई अपना लिया है। लगभग 72 फीसदी लोगों ने डिजिटल भुगतान से संतुष्टि जताई क्योंकि इससे लेनदेन तेजी से होने के साथ ही लेखा-जोखा साफ-सुथरे तरीके से रखने में मदद मिलती है और संचालन भी आसान रहता है। 57 फीसदी ने बिक्री में बढ़ोतरी होने की बात कही।
व्यापकता, लेन-देन की रफ्तार और अंतर-संचालनीयता के मामले में दुनिया की कोई भी अन्य खुदरा भुगतान प्रणाली यूपीआई की बराबरी नहीं कर सकती। सबसे अच्छी बात यह है कि उपयोगकर्ताओं के लिए यह बिल्कुल निःशुल्क है। यह एक अनूठी वित्तीय संरचना है। हालांकि, वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग (डीएफएस) और आरबीआई, दोनों का मानना है कि यह निःशुल्क ढांचा लंबे समय तक नहीं चल सकता।
भर्तृहरि महताब की अध्यक्षता वाली वित्त संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने हाल ही में वही बात कही जो भुगतान उद्योग निजी तौर पर चर्चा कर रहा था। वह बात यह थी कि वर्तमान शून्य मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) नीति एक स्थायी समाधान नहीं है। समिति ने प्रस्ताव दिया है कि रेहड़ी-पटरी पर दुकान लगाने वाले (स्ट्रीट वेंडर) और छोटे व्यवसाय को निःशुल्क सेवाएं जारी रखी जा सकती हैं मगर यूपीआई के माध्यम से होने वाले बड़े वाणिज्यिक लेनदेन के लिए शुल्क लिए जा सकते हैं। डीएफएस ने संसदीय समिति के इस तर्क के पीछे आंकड़ों की पुष्टि की है।
सरकार फिलहाल शून्य एमडीआर लेनदेन प्रोत्साहित करने के लिए एक प्रोत्साहन योजना के माध्यम से बैंकों, भुगतान प्रणाली संचालकों और ऐप प्रदाताओं को मुआवजा देती है। डीएफएस ने समिति को बताया कि यह प्रोत्साहन योजना उद्योग की वास्तविक लागत के केवल 11 फीसदी हिस्से की ही भरपाई करती है। यह वर्तमान नीति के तहत उद्योग द्वारा छोड़े गए एमडीआर राजस्व का केवल 14 फीसदी ही दर्शाती है।
पिछले कुछ वर्षों में प्रोत्साहन योजना के तहत किए गए आवंटन संरचनात्मक अंतर की पुष्टि करते हैं। वित्त वर्ष 2022 में लगभग 1,500 करोड़ रुपये, वित्त वर्ष 2023 में लगभग 2,600 करोड़ रुपये, वित्त वर्ष 2024 में लगभग 3,500 करोड़ रुपये और वित्त वर्ष 2025 में यह तेजी से घटकर लगभग 1,500 करोड़ रुपये रह गया। इसी वित्त वर्ष रुपे डेबिट कार्ड के लिए प्रोत्साहन राशि में काफी कमी की गई थी।
आइए, पहले समझने की कोशिश करते हैं कि भारत में भुगतान ढांचे किस तरह काम करते हैं। ये प्लेटफॉर्म उपभोक्ताओं और व्यापारियों को आपस में जोड़ते हैं और दोनों पक्ष इसमें लाभ देखते हैं। ऐसे प्लेटफॉर्मों पर किए गए शोध से एक स्पष्ट मूल्य निर्धारण सिद्धांत स्थापित होता है जिसके तहत एक पक्ष से शुल्क लिया जाता है जबकि दूसरे पक्ष को सब्सिडी दी जाती है जिससे सभी के लिए यह तंत्र महत्त्वपूर्ण हो जाता है।
इस प्लेटफॉर्म की सफलता के लिए मूल्य ढांचा महज एक संयोग नहीं है बल्कि यह निर्धारित करता है कि लागत और प्रोत्साहन साझेदारों के बीच कैसे वितरित हों। उदाहरण के लिए जीन-चार्ल्स रोशेट और जीन टिरोल द्वारा बहुपक्षीय प्लेटफॉर्मों और दोपक्षीय बाजारों पर किए गए अग्रणी शोध से पता चलता है कि गूगल, वीजा और एमेजॉन जैसी कंपनियां विभिन्न ग्राहक समूहों से अलग-अलग कीमतें लेकर दोनों पक्षों की भागीदारी प्रोत्साहित करती हैं। यूपीआई के शुरुआती मूल्य निर्धारण ढांचे ने दोनों पक्षों को एक साथ सब्सिडी दी। इस प्रणाली को अपनाने के चरण में ऐसा करना ठीक था।
बिना किसी लागत वाली लेनदेन ने कुछ ही वर्षों में कम से कम 5 करोड़ उपयोगकर्ताओं और लाखों छोटे व्यापारियों को जोड़ने में अहम भूमिका निभाई। वास्तव में, शून्य-एमडीआर व्यवस्था उस समय उपयुक्त नीति थी। हालांकि, आज नीति-निर्माताओं के सामने समस्या अलग है। जब बुनियादी ढांचा लागत वसूली तंत्र के बिना संचालित होता है तो निवेश के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं होता और समय के साथ यह धीमी गति से और असमान रूप से कम होने लगता है।
समिति का प्रस्ताव वितरण संबंधी उन आपत्तियों का समाधान करता है जिन्होंने एमडीआर से जुड़ी बहस को वर्षों से रोक कर रखा है। छोटे कारोबारियों और व्यक्तिगत उपयोगकर्ताओं के लिए कोई शुल्क नहीं है। यह शुल्क केवल बड़े वाणिज्यिक संस्थानों और उच्च मात्रा वाले संस्थागत उपयोगकर्ताओं पर लागू होता है। संगठित खुदरा, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म और बड़े प्रारूप वाले सेवा प्रदाताओं की बात करें तो यूपीआई एक प्रतिस्पर्द्धी लाभ प्रदान करता है।
प्रश्न यह है कि क्या बड़े वाणिज्यिक उपयोगकर्ता मामूली शुल्क लगाए जाने पर यूपीआई से लेनदेन कम कर देंगे?
यूपीआई की उपभोक्ताओं तक व्यापक पहुंच और किसी विश्वसनीय विकल्प के अभाव को देखते हुए इस बात की आशंका काफी कम है।
डीएफएस ने समिति के समक्ष एमडीआर बहस से परे एक समस्या भी उठाई है जिसमें कहा गया है कि डिजिटल भुगतान का उपयोग अभी भी शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित है। ग्रामीण और कम सुविधा प्राप्त क्षेत्रों में कारोबारी स्वीकृत बुनियादी ढांचा, संपर्क और उन्हें इस प्लेटफॉर्म से जोड़ने की पहल आदि का अभाव है। सरकार ने इस समस्या के समाधान के लिए प्रोत्साहन योजना में कैशबैक का पहलू जोड़ा है।
जनवरी 2020 में यूपीआई तेजी से अपनाने के लिए एक अस्थायी उपाय के रूप में शून्य-एमडीआर नीति शुरू की गई थी। छह साल बाद यूपीआई प्रणाली अभूतपूर्व स्तर पर अपनाई गई है मगर यह अस्थायी उपाय अभी भी जारी है।
बड़े व्यवसायों के लिए समयबद्ध, स्तरीय एमडीआर लागू करना उचित है जिसमें छोटे व्यापारियों और व्यक्तियों को स्थायी रूप से छूट दी जाए। साथ ही, बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और ग्रामीण विस्तार के लिए राजस्व का आवंटन भी जरूरी है।
देश के 376 जिलों के कम से कम 39,000 उपयोगकर्ताओं के हालिया सर्वेक्षण में केवल 25 फीसदी ने लेनदेन शुल्क देने की इच्छा व्यक्त की। शेष 75 फीसदी ने संकेत दिया कि शुल्क लागू होने पर वे यूपीआई का उपयोग बंद कर देंगे। हालांकि, सर्वेक्षण में शामिल उपयोगकर्ताओं को चिंता करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि केवल बड़े व्यापारियों को ही शुल्क देना पड़ सकता है।
(लेखक जन स्मॉल फाइनेंस बैंक लिमिटेड में वरिष्ठ सलाहकार हैं)