वर्ष 2024 के अप्रैल महीने के पहले हफ्ते में वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग (डीएफएस) ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के प्रमुखों के साथ एक समीक्षा बैठक की। इस बैठक में बैंकिंग क्षेत्र के उससे पिछले हफ्ते के महत्त्वपूर्ण व्यावसायिक आंकड़ों की जांच की गई। इस दौरान यह पाया गया कि 31 मार्च (जो वित्त वर्ष का आखिरी दिन था) और 5 अप्रैल के बीच अधिकांश सरकारी बैंकों के ऋण और जमा पोर्टफोलियो में भारी कमी देखी गई थी। बैंकों की संपत्ति और देनदारियों में 2 फीसदी से लेकर 5 फीसदी तक की कमी आई थी।
आमतौर पर, हर तिमाही के आखिरी दिनों में विशेषकर मार्च में जब वित्त वर्ष समाप्त होता है तब ऋण और जमा की राशि में अचानक वृद्धि होती है जो बाद में जल्दी गिर जाती है। यह बैंकों की बैलेंसशीट का एक सामान्य हिस्सा है, न सिर्फ सरकारी बैंकों के लिए बल्कि अन्य बैंकों के लिए भी।
यह कैसे होता है? बैंकों द्वारा मार्च के आखिरी दिनों में बड़ी, उच्च-लागत वाली जमाएं ली जाती हैं जो केवल कुछ दिनों के लिए होते हैं। इनमें व्यक्तिगत ग्राहकों से ली गई बड़ी तादाद में मियादी जमाएं और सरकारी फंड शामिल होते हैं। इसके साथ ही बैंकों द्वारा बची हुई कार्यशील पूंजी सीमाओं को चालू और बचत खातों में भी डाला जाता है। मार्च अंत तक परिपक्व होने वाली मियादी जमाओं को भी बचत खातों में डाला जा सकता है अगर ग्राहक इसके लिए अपनी सहमति दे देता है।
परिसंपत्ति के मोर्चे पर देखें तो बैंक शाखाएं, कर्ज लेने वालों को कुछ दिनों के लिए बैंक में पड़ी नकदी को ऋण के तौर पर लेने और ओवरड्राफ्ट सीमाओं का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित करती हैं। बैंकों द्वारा बहुत कम दर पर बहुत लघु अवधि के लिए कॉरपोरेट ऋण भी दिए जाते हैं। ऐसे ऋण से ली गई रकम अक्सर उसी बैंक या किसी अन्य बैंक के जमा पोर्टफोलियो में एक साथ आ जाती है।
इसके अलावा, बैंकों द्वारा ऋण वृद्धि को बढ़ावा देने के लिए सावधि जमाओं की एवज में भी ऋण दिए जाते हैं। जिन बैंकों की विदेशी शाखाएं होती हैं या जिनके पास बड़े कॉरपोरेट ऋण होते हैं, वे आम तौर पर साल के अंत के आसपास समूह के भीतर लेन-देन की सुविधा देते हैं जिन्हें अप्रैल के पहले हफ्ते में वापस ले लिया जाता है। अब सवाल यह है कि आखिर यह सब क्यों किया जाता है?
इस तरह के लेनदेन का मुख्य उद्देश्य बैंकों की बैलेंसशीट यानी ऋण और जमाओं को कुछ समय के लिए अधिक दिखाना होता है। असल में, इनसे बैंक को लंबे समय का ब्याज लाभ नहीं मिलता। इनका मकसद सिर्फ यह होता है कि रिपोर्टिंग की तारीख पर बैंक के आंकड़े अच्छे दिखें और उसके वित्तीय अनुपात बेहतर नजर आएं।
इस तरह के रुझान के केंद्र में बैंकों के बैलेंसशीट को बड़ा दिखाने का दबाव है, भले ही इससे मुनाफे में खास बढ़ोतरी न हो। बैंकों में तय लक्ष्यों को पूरा करने का दबाव इस पूरी प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाता है। हाल ही में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए संशोधित प्रदर्शन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) फ्रेमवर्क भी वरिष्ठ प्रबंधन पर साल के अंत में ज्यादा से ज्यादा कारोबार दिखाने का दबाव बढ़ा सकता है।
यह सच है कि इस पूरी प्रक्रिया से साल के अंत के आंकड़े बेहतर दिखते हैं, लेकिन इसके साथ कई तरह की लागत भी जुड़ी होती है। जब बैंक थोड़े समय के लिए अपने ऋण को बढ़ाते हैं तब उन्हें उतनी ही मात्रा में जमाएं भी जुटानी पड़ती है। इसके लिए अक्सर वे महंगी बड़ी जमाओं का सहारा लेते हैं। इससे फंड जुटाने की लागत बढ़ जाती है और शुद्ध ब्याज मार्जिन (एनआईएम) यानी कमाई यानी कमाई की सीमा कम हो जाती है। इसके अलावा, कुछ और समस्याएं भी सामने आती हैं।
उदाहरण के लिए, अगर जमाएं थोड़े समय के लिए भी बढ़ती हैं तो बैंकों को नकद आरक्षी अनुपात (सीआरआर) और वैधानिक तरलता अनुपात (एसएलआर) के नियमों को पूरा करने में ज्यादा खर्च करना पड़ता है। सीआरआर वह हिस्सा होता है, जिसे वाणिज्यिक बैंकों को अपनी देनदारियों में से केंद्रीय बैंक के पास रखना पड़ता है, और इस पर उन्हें कोई ब्याज नहीं मिलता। एसएलआर नियमों को पूरा करने के लिए बैंकों को अपनी राशि का एक हिस्सा सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश करना होता है।
इसके अलावा, जमा राशि भले ही कुछ दिनों के लिए भी बढ़ती हो तब भी बैंकों को जमाओं पर बीमा कवर के लिए ज्यादा प्रीमियम भी देना पड़ता है। ये सभी चीजें बैंकों की लागत बढ़ा देती हैं। बैंकिंग क्षेत्र में असली और टिकाऊ प्रदर्शन पूरे साल के औसत बैलेंस पर मिलने वाले एनआईएम से आता है, न कि 31 मार्च या तिमाही के आखिरी दिन के एक दिन के आंकड़ों से। ऋण बढ़ाने से गैर निष्पादित परिसंपत्ति में भी कृत्रिम तरीके से कमी आ जाती है।
आंकड़ों को कुछ समय के लिए बेहतर दिखाने के अलावा भी बैलेंसशीट को आकर्षक दिखाने के कई तरीके हैं। उदाहरण के तौर पर कुछ एकबारगी उपायों के जरिये अल्पकालिक तौर पर शुद्ध मुनाफा बढ़ाया जा सकता है जिनमें प्रावधानों में बदलाव, आस्थगित कर समायोजन या ट्रेजरी से होने वाले अस्थिर लाभ शामिल हैं। ऐसे उपायों से मुनाफा बढ़ता हुआ दिखता है, भले ही बैंक के वास्तविक परिचालन लाभ और एनआईएम धीमी गति से बढ़ रहे हों। इसके अलावा, बैंकों द्वारा बड़े पैमाने पर कर्ज को बैलेंसशीट से हटाना भी एक अहम कारक रहा है।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी द्वारा 16 मार्च को लोक सभा में दिए गए लिखित जवाब के मुताबिक, बैंकों ने वित्त वर्ष 2025 तक लगभग 9.75 लाख करोड़ रुपये के कर्ज को बट्टा खाते में डाला है। अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो वित्त वर्ष 2015 में यह राशि करीब 31,723 करोड़ रुपये थी। इसके बाद यह तेजी से बढ़ी और वित्त वर्ष 2020 में लगभग 1.59 लाख करोड़ रुपये के उच्च स्तर पर पहुंच गई जो बैंकिंग उद्योग में फंसे कर्ज के शीर्ष स्तर पर पहुंचने के करीब दो साल बाद हुआ।
इसके बाद से कर्ज के बट्टा खाते में डालने में कमी आई और वित्त वर्ष 2025 में यह घटकर लगभग 47,568 करोड़ रुपये रह गई। कुछ वक्त के लिए बेहतर आंकड़े दिखाने जैसे रुझान को रोकने का सबसे प्रभावी तरीका यह है कि बैंकों के प्रदर्शन को मापने और प्रशासन के मानकों को तय करने का तरीका बदला जाए। अभी तक ध्यान किसी एक खास तारीख (जैसे 31 मार्च) के आंकड़ों पर रहता है, जबकि इसे बदलकर पूरे साल के औसत प्रदर्शन और स्थिरता पर केंद्रित किया जा सकता है।
अगर आंतरिक लक्ष्य, नियामकीय मूल्यांकन और बाजार की सोच इस बात पर जोर दे कि पूरे साल के दौरान औसत ऋण जमा, जोखिम के अनुसार रिटर्न और परिचालन लाभ कैसे रहे तब साल के आखिरी दिन आंकड़े सुधारने का रुझान अपने आप कम हो जाएगा। बैंकिंग तंत्र को ऐसे बैलेंसशीट की जरूरत है जो पूरे साल स्थिर और भरोसेमंद रहें, न कि सिर्फ एक दिन के लिए मजबूत दिखें।
(लेखक जन स्मॉल फाइनैंस बैंक लिमिटेड के वरिष्ठ सलाहकार हैं)