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‘सहयोग’ पोर्टल पर घिरी सरकार: कर्नाटक हाई कोर्ट ने एक्स कॉर्प की याचिका पर मांगा केंद्र से जवाब

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'सहयोग' एक ऑनलाइन प्रणाली है, जिसका उपयोग अधिकारी संबंधित वेबसाइटों को सामग्री हटाने के निर्देश जारी करने के लिए करते हैं

Last Updated- March 10, 2026 | 9:59 PM IST
Karnataka High Court
कर्नाटक उच्च न्यायालय | फोटो क्रेडिट: Commons

कर्नाटक उच्च न्यायालय ने मंगलवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स कॉर्प (पूर्व में ट्विटर) द्वारा केंद्र सरकार के ‘सहयोग’ पोर्टल की वैधता पर सवाल उठाने वाली अपील पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। ‘सहयोग’ एक ऑनलाइन प्रणाली है, जिसका उपयोग अधिकारी संबंधित वेबसाइटों को सामग्री हटाने के निर्देश जारी करने के लिए करते हैं। कर्नाटक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश विभु बाकरू और न्यायमूर्ति सीएम पूनाचा के खंडपीठ ने मामले की सुनवाई 11 जून तय की है।

अपील में एकल न्यायाधीश के पीठ के सितंबर 2025 के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें सहयोग पोर्टल की वैधता को बरकरार रखा गया था। उस फैसले में न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना ने एक्स की याचिका को खारिज करते हुए कहा था कि कंपनी संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत भारतीय नागरिकों के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार पर चोट नहीं कर सकती। एक्स ने खंडपीठ के समक्ष तर्क दिया कि सहयोग पोर्टल देश भर के सरकारी अधिकारियों और पुलिस अधिकारियों को सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के तहत निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया का पालन किए बिना ऑनलाइन सामग्री हटाने का निर्देश देने की शक्ति प्रदान करता है।

फैक्ट चेक यूनिट्स की चुनौती

इस बीच, उच्चतम न्यायालय मंगलवार को बॉम्बे हाई कोर्ट के सितंबर 2024 के उस फैसले को चुनौती देने के लिए केंद्र सरकार की याचिका पर विचार करने के लिए सहमत हो गया, जिसने सूचना प्रौद्योगिकी नियमों के उन प्रावधानों को अमान्य कर दिया था जो केंद्र को फैक्ट चेक यूनिट्स स्थापित करने में सक्षम बनाते हैं, लेकिन अदालत ने उच्च न्यायालय के फैसले के संचालन को रोकने के सरकार के अनुरोध को अस्वीकार कर दिया।

उच्चतम न्यायालय ने किया यूसीसी का समर्थन

उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को टिप्पणी करते हुए कहा कि समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विभिन्न पर्सनल लॉ की वजह से उत्पन्न होने वाले टकराव को दूर करने का सबसे प्रभावी तरीका हो सकता है। अदालत एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के कुछ प्रावधान महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन करते हैं। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति आर. महादेवन के पीठ ने संकेत दिया कि पर्सनल लॉ में सुधार का सवाल न्यायिक हस्तक्षेप के बजाय कानून के माध्यम से बेहतर ढंग से किया जा सकता है। न्यायमूर्ति बागची ने अपनी टिप्पणी में कहा कि वैकल्पिक वैधानिक ढांचे के बिना पर्सनल लॉ के प्रावधानों को रद्द करने से कानूनी संकट पैदा हो सकता है। उनके अनुसार, संसद द्वारा अधिनियमित एक व्यापक कानून ऐसे मुद्दों को हल करने के लिए बेहतर रास्ता होगा।

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First Published - March 10, 2026 | 9:59 PM IST

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